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बिरसा मुंडा

नागारानी गाइडिन्ल्यू

नागारानी गाइडिन्ल्यू
इनका जन्म 26 जनवरी सन् 1885 को नागालैंड के घने जंगलों के बीच बसे गाँव लांगकाओ में हुआ। 13 वर्ष की अवस्था से ही ये स्वतंत्रता संग्राम में अपने भाई जादोनांग के साथ सम्मिलित हो गई थी। जादोनांग की मृत्यु के बाद 17 वर्ष की अवस्था में इन्होंने नागा जनजाति का नेतृत्व संभालां एवं 4000 से अधिक खूंखार नागा बटालियन की गुरिल्ला सेना के द्वारा अंग्रेजों की छावनी पर कई बार हमले किये। ब्रिटिश सेना इनके आतंक से इतनी डरी हुई थी कि इन पर इनाम रख दिया था। किन्तु ये कभी अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आई। गांव की जनता इन्हें ईश्वर की तरह पूजती थी एवं संरक्षण देती थी। रानी की गुरिल्ला सेना की असम राइफल के साथ अनेकों बार मुठभेड़ हुई। लूटमार करके इनकी सेना जंगलों में छिप जाती थी। रानी ने घोषणा की थी अंग्रेज मरेंगे या हम। 17 अक्टूबर 1932 को ब्रिटिश सेना ने अचानक हमला कर इन्हें व इनके साथियों को चारों ओर से घेर लिया, इन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। इन्हें रस्सियों से जकड़कर पीटते हुए अनेक यातनायें दी गई और इम्फाल जेल में बन्द कर दिया एवं इन्हें आजीवन कारावास दे दिया गया। इन्हें मुक्ति मिली 14 वर्ष बाद जब देश स्वतंत्र हुआ। इनके साहस व समर्पण को देख कर नेहरूजी ने इन्हें रानी की उपाधि से विभूषित किया। स्वतंत्रता के बाद इन्होंने कल्याण आश्रम के कार्य को महत्त्व दिया। ये इसकी सदस्या भी रही। अंत तक अपने धर्म की रक्षा में प्रयत्नशील रहीं। ये 1928 तक आदिवासी विकास परिषद् की संरक्षिका "विश्व हिन्दू परिषद्" की परामर्शदाता रही।

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